Tuesday, September 23, 2025

Time Travel? Diseases and Deaths?

 Kidney Stone? 

Gall Bladder Stone? 

Or What?

What happened to her that day?

What kinda pain was that?

How political parties, rather must say agents of political parties, frame diseases or synthesize them in such a perfect (imperfect?) manner?

Most such diseases are automation of system? Or? Highly enforced like lockdown time diseases or deaths during corona? Name any diseases and?

And my memories rushed down the lane, much back, over the years, some familiar faces who are no more, online or offline. Some faces I knew so little about, some faces so familiar? What had happened to them? They were fallen prey to some diseases? Or?

Or they were fallen prey to political parallel case creations?

Mic? Voice? Some student? Or scholar? Voice? Shr Vaani? 9th? Or? Some fever? Could not diagnose? Even when mighties of nearby PGI and far away medicals were around including Dr D.... Chaudhary?

Neo's (Or N D   V?) Mumbai chapter would like to talk about such topics? Or maybe some other channel? We don't, till the time it happens to some of our own? Or it might had happened with some of our own, but we have no idea about that? Because, almost all diseases are system's gift. Some are automatic system gifts and some kinda enforced in different ways? But chintus feel so many other important topics are there for discussion, like cricket? Like India, pakistan useless fights? Like religion, region, cast and other such blah, blah, blah? Or maybe even some muto-hago type or mussa collector type topics?

Monday, February 10, 2025

बीमारी को कितना जल्दी proliferate या Trigger या aggravate कर सकते हैं?

 Beyond Theatrics and Killer Politics? 

आपको उनकी कहानी नहीं पता और उन्हें आपकी। क्यूँकि, सालोँ या दशकों से ना आप उनसे मिले और ना वो आपसे। और ना ही इस दौरान कोई खास खबर एक दूसरे की। 

मगर, किसी खास वक़्त वो out of nowhere जैसे, आपसे मिलते हैं। उनकी ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव जानकार, हादसे या बीमारी जानकार आपको लगता है, ये तो?

जैसे घढ़ा हुआ-सा है? किसी फ़िल्मी-सी या सीरियल-सी, कहानी-सा लिखा हुआ जैसे? और वो उन्हीं लिखे हुए किरदारों-सी सिर्फ कहानी भर है? लिखी हुई कहानी-से किरदार? मगर ये किसी एक इंसान के बारे में नहीं है। ये तो जिससे भी मिलो, उसी की कहानी जैसे? ये लोग किसी खास वक़्त या दिन ही आपको क्यों मिलते हैं? इनकी कहानियाँ कैसे और कहाँ मिलती हैं? इन्हें कौन भेजता है? और फिर दूसरी तरफ क्या ड्रामे चलते हैं? दोनों तरफ ड्रामे एक ही पार्टी चलाती है या अलग-अलग पार्टियाँ?  

घर चाहिए? ये तरीका है?

नौकरी चाहिए? ये तरीका है?

अप्लाई ही नहीं करोगे, तो कैसे मिलेगा? 

Terms and Conditions Apply. 

किसी को अपने पैसे चाहिएँ। वो नहीं सुना आपने? 

इनसे आगे?

तुम्हारे कौन से पैर पे, कौन-सी जगह वो छोटी-सी गाँठ है? कब से? एक्सीडेंट? डिपार्टमेन्ट में बिल्कुल उसी जगह किसे थी? और आगे क्या हुआ?

ये जो हैं, इन्हें ये दिक्कत है। कौन से पैर पे, कहाँ और क्या खास है? और अब क्या चल रहा है? आसपास और भी कोई ऐसे-से केस हैं? 

इन केसों में कोई पैटर्न है क्या? क्या कोड है या हैं ये? Fraud? कितनी ज़िंदगियों के साथ?   

कहाँ रहने का क्या मतलब है? किसी भी बीमारी को कितना जल्दी proliferate या Trigger या aggrevate कर सकते हैं? कौन-कौन से factors? और कैसे? 

ऐसे ही कौन-से फैक्टर्स बिमारियों को होने से रोकते हैं? या  proliferate या Trigger या aggrevate होने से रोकते हैं या रोकने में सहायता करते हैं? कौन-कौन से factors और कैसे? 

ये दुनियाँ एक राजनितिक रँगमँच है। जिसमें आपको कब क्या होगा, कहाँ होगा और शायद कहाँ नहीं होगा, ये भी है। वो फिर क्या बीमारी? क्या शादी का होना या ना होना? या बच्चे का होना या ना होना। या दूसरी या तीसरी शादी का होना? बच्चों को साथ रखना या ना रखना? क्या शादी का चलना या ना चलना या घसीटना? सब कहीं का भी राजनितिक सिस्टम घड़ रहा है? कैसे अहम है? कहीं का भी सिस्टम, किस हद तक automation पे है? और किस हद तक manual? कुछ एक केसों को उठाकर जानने की कोशिश करें?

Friday, June 21, 2024

निगरानी और ज्ञान-विज्ञान का दुरुपयोग

 Surveillance and Knowledge Abuse? Or Diagnostic and Testings?

आसपास से केस स्टडी 

पीछे वाली पोस्ट का कुछ हिस्सा फिर से पढ़ते हैं


कैसे पता चलता है, की हमें कोई बीमारी है?

और कौन-सी बीमारी है?

नब्ज देखकर?

बिन पूछे और बिन जाने?

PK के जैसे? 

Wifi से?

Wifi, किसी का घर जाने का सिग्नल या सिस्टम?

और किसी का?

दरबार लगाने का जुगाड़ जैसे? 

बिन पूछे, आपके दर्द-तकलीफ़ बताना जैसे?

घोर Surveillance Abuse जैसे? 

इधर भी और उधर भी?      

या?

कोई दर्द या तकलीफ हो तो?

डॉक्टर के पास जाते हैं, 

और वहाँ डायग्नोस्टिक्स से पता चलता है?

या वहाँ भी गड़बड़ घोटाला जैसे?

या गड़बड़-घोटाला, 

हमारा दर्द या तकलीफ को फील करना ही है? 

खाना, पानी या हवा?

कैसे बचें इन प्रदुषित-मिलावटी हवा, पानी या खाने से?    

ये तो जिधर देखो उधर है 

कुछ जगह नज़र आता है 

मगर, 

बहुत जगह दिखाई तो साफ देता है 

मगर होता, प्रदूषित है। 

जैसे कोई pain inducers दे दिए हों,

किसी ने, आपकी जानकारी के बिना? 

किसी खाने में, या पानी में?

और डॉक्टर बोले, पथ्थरी है? 

डायग्नोस्टिक यही कह रहा है?


इस पथ्थरी के दर्द को और किस बीमारी के दर्द से बदला जा सकता है? कैंसर? और शायद और भी कितनी ही तरह की बीमारियाँ हो सकती हैं, जिनका नाम लिया जा सकता है? ऐसे कितने लोगों ने PK देखी होगी? या WIFI क्या होता है, का पता तक होगा? या दुनियाँ में ऐसे-ऐसे और कैसे-कैसे कारनामे भी होते हैं? कहाँ ज्ञान- विज्ञान का दुरुपयोग? और कहाँ अनपढ़, या कम पढ़े-लिखे लोग, कैसे-कैसे बाबाओं, महाराजों या झोला-छापों के चक्कर में पड़े गरीब लोग? जहाँ ढंग से खाने-पीने या रहने तक के पैसे नहीं होते और लूटवा देते हैं ज़िंदगियाँ, ऐसे-ऐसे बाबाओं को। उसपे उन्हें समझाना भी आसान नहीं होता।        

ऐसा ही एक कैंसर के मरीज का आसपास सुनने को मिला। जो ऐसे-ऐसे महाराजों के चक्कर आज तक काटते हैं। जो दूर से ही बिन जाज़ें, परखे या टेस्ट्स के सबकुछ बता देते हैं? और इनपे या इन जैसे झोला-छापों पे कोई कारवाही नहीं करता? इनके नाम, जगह वैगरह जानोगे, तो पता चलेगा, so-called सिस्टेमैटिक कोड इतना जबरदस्त चलता है? पर फिर जो मुझे समझ आया, ऐसा-सा ही छोटे से छोटे हॉस्पिटल से लेकर, बड़े हॉस्पिटल्स तक है। जानकार लोग इनपे कोई किताबें क्यों नहीं लिखते या आमजन को अवगत क्यों नहीं कराते? यही सिस्टम रोकता है क्या, उन्हें ऐसा करने से?       

जब PhD में थी तो आसपास कुछ खास किस्म के कारनामे होते थे। वैसे से हर जगह संभव हैं। जैसे आप कोई एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं और आपसे जलने वाले या वाली ने, आपकी vials, test tubes या कुछ और भी हो सकता है, जिसमें आपका एक्सपेरिमेंटल मैटेरियल है, बदल दें या उसमें कुछ उल्टा-पुल्टा डालके उसे खराब कर दें। आसपास कितनों के साथ होता था ऐसे? पूछकर देखो। या अभी भी शायद कितनी ही लैब्स में होता है? आप लगे रहो, बार-बार उसे दोहराने। परिणाम क्या होंगे? निर्भर करता है की उस बन्दे ने क्या किया है। ये तो वही बेहतर बता सकता है या सकती है या सकते हैं? किसी भी डायग्नोस्टिक सेंटर पे, ये या ऐसे-ऐसे कितने ही किस्म के कारनामे संभव है। उसपे डॉक्टर डायग्नोज़ करके कितनी सारी सम्भानाएं रखते हैं, खासकर जब दर्द-तकलीफ दूर ना हो?

Probability Factor। ये नहीं है, तो ये हो सकता है। ये नहीं, तो ये। ये भी नहीं, तो ये। ये कोड और सिस्टम के जाले कितनों को पता होते हैं? और कौन ऐसे सोचके बीमारी का पता लगाते हैं? हो सकता है, की कोई बीमारी हो ही नहीं? गुप्त तरीके से कुछ उल्टा-पुल्टा, यहाँ-वहाँ से खिलाया या पिलाया गया हो? उसके साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं? जैसे ही उस खिलाने-पिलाने का असर खत्म, वैसे ही बीमारी। ये तो कुछ-कुछ ऐसे नहीं हो गया, जैसे, इन डायग्नोस्टिक्स और संभानाओं के चक्कर में, इतना कुछ मेडिसिन के रुप में खिलाके या ऑपरेशन तक करके, ना हुई बीमारियों की बाढ़ जैसे? यही हाल हैं, हमारे आज के समाज के? 

आदमी अभी वो मशीन कहाँ बना है, की कुछ भी तोड़ो-फोड़ो, कुछ भी खिलाओ-पिलाओ या कैसे भी, कहीं से भी काटो और मशीन-सा सब सही हो जाएगा?

Tuesday, April 9, 2024

बीमारी एक प्रकिर्या है

 Disease is a Process. 

नया क्या है इसमें? ये तो सबको पता है? या शायद नहीं भी पता?

और क्या हो जब वो बीमारी Autoimmune Disorder हो ? 

एक ऐसा डिसऑर्डर, जिसमें शरीर का रक्षा विभाग, अपने ही शरीर की स्वस्थ सैल (cells) को खाने का काम करने लगता है।   

जिन्हें नहीं पता उनके लिए, शरीर का भी अपना रक्षा विभाग होता है। ऐसा रक्षा विभाग, जो आज भी संसार की किसी भी डिफ़ेंस या मिलिट्री फ़ोर्स से ज्यादा ताकतवर है। जिसके बहुत से अज्ञात रहस्य, सुक्ष्म (Molecular) स्तर पर आज तक पता नहीं है की वो कैसे काम करते हैं। और कैसे डिसऑर्डर में बदल जाते हैं? इसलिए, बहुत से बिमारियों के आज तक स्थाई समाधान नहीं है। जिन्हें आज तक या तो कुछ सालों टाला जा सकता है या कहो की ज़िंदगी को थोड़ा और बढ़ाया जा सकता है, कुछ तरीके अपनाके। बहुत से केसों में, एक स्तर पे ही रोका जा सकता है। और बहुत से केसों में वापसी भी संभव है।    

आपको पता चले की आपकी नौकरी का वातावरण एक Autoimmune Disorder में बदल चुका है। तो या तो आप उससे लड़ने की कोशिश करेंगे या उससे बाहर निकलने की। शुरू-शुरू में मैंने लड़ने की कोशिश की। मगर जब लगा की यहाँ लड़ाई का स्तर कुछ ज्यादा ही ख़तरनाक हो रहा है, तो उससे कुछ वक़्त बाहर रहकर देखने की कोशिश की। क्यूँकि, अगर आप स्वस्थ ही नहीं रहोगे तो क्या तो लड़ोगे और क्या ही करोगे? ऐसे माहौल में ख़त्म ही हो जाओगे। 

मगर उस बाहर रहकर देखने ने इतना कुछ दिखा दिया की लगा, ऐसी प्रकिर्या को ख़त्म करने की ज़रूरत है या उससे जैसे भी हो सके, बाहर निकलने की। क्युंकि, मुझे जो समझाया गया या समझ आया वो ये, की ये राजनीतिक सिस्टम की प्रकिर्या है, जिसको जैसे आप चाहते हैं, वैसे ख़त्म नहीं कर सकते हैं। वो किसी एक के वश में नहीं है। चाहे फिर वो इंसान हो या पार्टी। हाँ, शायद उससे दूर हो सकते हैं। उस नौकरी से और उस जगह के सिस्टम से दूर होकर या रहकर। 

भाभी का हादसा और उस दौरान या उसके बाद जो कुछ हुआ, वो शरीर के Autoimmune Disorders का तो पता नहीं, पर किसी भी जगह के राजनीतिक सिस्टम के ऑटोइम्म्युन डिसऑर्डर  को जरुर उधेड़ रहा था। किसी भी जगह, घर, अड़ोस-पड़ोस, मौहल्ला या समाज में जब लोग आपस में ही एक दूसरे को खाने लगें, तो उसे समाज का Autoimmune Disorder कह सकते हैं। 

Social Autoimmune Disorder? 

मुझे लगता है की Social Autoimmune Disorder को समझ कर,  ऐसी बिमारियों से लोगों को सचेत जरुर किया जा सकता है। अगर सही से Molecular Autoimmune Disorder को जीव-विज्ञान की भाषा में परिभाषित नहीं भी किया जा सके, तो भी शायद से बचाया जा सकता है। और काफ़ी हद तक वापस स्वास्थ्य की तरफ मोड़ा जा सकता है। उसे समझने से पहले, कुछ बच्चों, बड़ों या बुजर्गों के खेलों पर गौर फ़रमाते हैं। ख़ासकर, जहाँ मैं पिछले तक़रीबन 2-साल से रह रही हूँ, वहाँ के ड्रामों को या खेलों को। 

क्या ये खेल या रोज-रोज के ड्रामे, लोगों की बिमारियों को भी परिभाषित कर सकते हैं?  

उनके कारणों और निवारणों को भी बता सकते हैं? 

शायद हाँ? शायद ना? मुझे लगता है, हाँ। खासकर, अगर आपको थोड़ी-बहुत इकोलॉजी या एनवायरनमेंट की भी समझ है तो। तो जानने में क्या जाता है? आते हैं आगे ऐसी कुछ पोस्ट पे। 

Sunday, January 28, 2024

Designing & Engineering of Birth, Diseases, Death & Rebirth? 5

 पुनर्जन्म क्या होता है? 

ये Entire Political Science का सबसे भद्दा रुप है। आम आदमी को बेवकूफ बना, अपना उल्लू सीधा करना। कोई एक घर से गया हुआ इंसान, किसी दूसरे घर में आ सकता है क्या? हाँ। शायद, जैसे तलाक के बाद होता है। बगैर तलाक के, संभव है?

इस घर के जन्मदिन और शादियों की तारीखें चैक करो, जहाँ से कोई इंसान दुनियाँ को ही अलविदा कह गया, जिस किसी वजह से। किस दिन गया, वो भी। और उस घर के इंसानों के जन्मदिन और शादियों की तारीखें पता करो, जिसमें कोई तलाक के बाद या दौरान ही, कोई नई बहु लाया है। जिसे इस राजनीती के चालबाज़ धंधे में in बोलते हैं। जैसे live-in . Live-in? ऐसे होता है? हमारे यहाँ आम बोलचाल की भाषा में तो उसे "चुन्नी उढ़ा लाए" बोलते हैं या "5 आदमी गए थे बयाण", बोलते हैं शायद? वैसे ये "चुन्नी उढ़ाने का" या "5-आदमी गए थे बयाण" का  रिवाज़ कब से शुरू हुआ? ये Human Robotics गढ़ने वाले कलाकारों के दिमाग की देन नहीं लगता?

सबसे बड़ी और मजेदार बात, यहाँ भी किसी एक पार्टी का मानव रोबोट के पुनर्जन्म का अधिकार सुरक्षित नहीं है। जिन-जिन पार्टियों में इतने जोड़-तोड़ और मरोड़ की काबिलियत है, वही कर देती हैं। जैसे अलग-अलग शादियों के डिज़ाइनर अलग-अलग पार्टियाँ होती हैं। वैसे ही यहाँ भी, इस तरह के आसपास ही, एक से ज्यादा नमूने देखने को मिल सकते हैं। इनके बारे में जितनी ज्यादा सही जानकारी, आपको पता होगी और इन कोढों के बारे थोड़ा बहुत ज्ञान भी, उतना ही ज्यादा, आप इनके बारे में बढ़िया से जान सकते हैं, या बता सकते हैं। और ये इस तरह की दौबारा शादीयां ही पुनर्जन्म (?) का हिस्सा नहीं है। 

जो इंसान गया है, उसके मानव रोबोट version की अगली पीढ़ी भी तो लानी है। तो क्या होगा? जहाँ से गया है, जिस हॉस्पिटल से, वहाँ आसपास से ही कोई खास पैदाइश भी मिलेगी। अब वो तारीखें भी पता कर लें। उनके माँ-बाप के नाम, पते वगैर भी। जितनी उनके बारे में जानकारी होगी, उतना ही ये समझ आएगा, की किस कदर इंसान पे कंट्रोल है, इन राजनीतिक पार्टियों का और बड़ी-बड़ी कंपनी के समूहों का। कैसे ये सामाजिक घड़ाईयाँ, महज सामाजिक व्यवस्था या सिस्टम की ही पोल नहीं खोलती, बल्की आम-आदमी के शोषण का क्रूर और भद्दे से भद्दा, रूप भी दर्शाती हैं।   

जो जाते हैं, वो वापस कहाँ आते हैं? अभी तक तो संभव हुआ नहीं। हाँ। ये आदमखोर-सिस्टम जरुर, ऐसे-ऐसे और कैसे-कैसे लोगों को खा रहा है, सिर्फ वर्चस्व की लड़ाई और कुर्सियों के चक्कर में। और कितने ही छोटे-मोटे लालच या डर, इंसान को देकर। कितने ही रिश्तों के जोड़-तोड़, कितने ही ना हुई बिमारियों के ढेर आम आदमी को देकर।     

ऊपर दी गई कई सारी सामाजिक घड़ाइयों के किरदारों के नाम तो नहीं लिखे जा सकते। मगर, ऐसे ही केसों को आप अपने आसपास से भी समझ सकते हैं। एक नहीं, शायद कई मिलेंगे।