Friday, June 21, 2024

निगरानी और ज्ञान-विज्ञान का दुरुपयोग

 Surveillance and Knowledge Abuse? Or Diagnostic and Testings?

आसपास से केस स्टडी 

पीछे वाली पोस्ट का कुछ हिस्सा फिर से पढ़ते हैं


कैसे पता चलता है, की हमें कोई बीमारी है?

और कौन-सी बीमारी है?

नब्ज देखकर?

बिन पूछे और बिन जाने?

PK के जैसे? 

Wifi से?

Wifi, किसी का घर जाने का सिग्नल या सिस्टम?

और किसी का?

दरबार लगाने का जुगाड़ जैसे? 

बिन पूछे, आपके दर्द-तकलीफ़ बताना जैसे?

घोर Surveillance Abuse जैसे? 

इधर भी और उधर भी?      

या?

कोई दर्द या तकलीफ हो तो?

डॉक्टर के पास जाते हैं, 

और वहाँ डायग्नोस्टिक्स से पता चलता है?

या वहाँ भी गड़बड़ घोटाला जैसे?

या गड़बड़-घोटाला, 

हमारा दर्द या तकलीफ को फील करना ही है? 

खाना, पानी या हवा?

कैसे बचें इन प्रदुषित-मिलावटी हवा, पानी या खाने से?    

ये तो जिधर देखो उधर है 

कुछ जगह नज़र आता है 

मगर, 

बहुत जगह दिखाई तो साफ देता है 

मगर होता, प्रदूषित है। 

जैसे कोई pain inducers दे दिए हों,

किसी ने, आपकी जानकारी के बिना? 

किसी खाने में, या पानी में?

और डॉक्टर बोले, पथ्थरी है? 

डायग्नोस्टिक यही कह रहा है?


इस पथ्थरी के दर्द को और किस बीमारी के दर्द से बदला जा सकता है? कैंसर? और शायद और भी कितनी ही तरह की बीमारियाँ हो सकती हैं, जिनका नाम लिया जा सकता है? ऐसे कितने लोगों ने PK देखी होगी? या WIFI क्या होता है, का पता तक होगा? या दुनियाँ में ऐसे-ऐसे और कैसे-कैसे कारनामे भी होते हैं? कहाँ ज्ञान- विज्ञान का दुरुपयोग? और कहाँ अनपढ़, या कम पढ़े-लिखे लोग, कैसे-कैसे बाबाओं, महाराजों या झोला-छापों के चक्कर में पड़े गरीब लोग? जहाँ ढंग से खाने-पीने या रहने तक के पैसे नहीं होते और लूटवा देते हैं ज़िंदगियाँ, ऐसे-ऐसे बाबाओं को। उसपे उन्हें समझाना भी आसान नहीं होता।        

ऐसा ही एक कैंसर के मरीज का आसपास सुनने को मिला। जो ऐसे-ऐसे महाराजों के चक्कर आज तक काटते हैं। जो दूर से ही बिन जाज़ें, परखे या टेस्ट्स के सबकुछ बता देते हैं? और इनपे या इन जैसे झोला-छापों पे कोई कारवाही नहीं करता? इनके नाम, जगह वैगरह जानोगे, तो पता चलेगा, so-called सिस्टेमैटिक कोड इतना जबरदस्त चलता है? पर फिर जो मुझे समझ आया, ऐसा-सा ही छोटे से छोटे हॉस्पिटल से लेकर, बड़े हॉस्पिटल्स तक है। जानकार लोग इनपे कोई किताबें क्यों नहीं लिखते या आमजन को अवगत क्यों नहीं कराते? यही सिस्टम रोकता है क्या, उन्हें ऐसा करने से?       

जब PhD में थी तो आसपास कुछ खास किस्म के कारनामे होते थे। वैसे से हर जगह संभव हैं। जैसे आप कोई एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं और आपसे जलने वाले या वाली ने, आपकी vials, test tubes या कुछ और भी हो सकता है, जिसमें आपका एक्सपेरिमेंटल मैटेरियल है, बदल दें या उसमें कुछ उल्टा-पुल्टा डालके उसे खराब कर दें। आसपास कितनों के साथ होता था ऐसे? पूछकर देखो। या अभी भी शायद कितनी ही लैब्स में होता है? आप लगे रहो, बार-बार उसे दोहराने। परिणाम क्या होंगे? निर्भर करता है की उस बन्दे ने क्या किया है। ये तो वही बेहतर बता सकता है या सकती है या सकते हैं? किसी भी डायग्नोस्टिक सेंटर पे, ये या ऐसे-ऐसे कितने ही किस्म के कारनामे संभव है। उसपे डॉक्टर डायग्नोज़ करके कितनी सारी सम्भानाएं रखते हैं, खासकर जब दर्द-तकलीफ दूर ना हो?

Probability Factor। ये नहीं है, तो ये हो सकता है। ये नहीं, तो ये। ये भी नहीं, तो ये। ये कोड और सिस्टम के जाले कितनों को पता होते हैं? और कौन ऐसे सोचके बीमारी का पता लगाते हैं? हो सकता है, की कोई बीमारी हो ही नहीं? गुप्त तरीके से कुछ उल्टा-पुल्टा, यहाँ-वहाँ से खिलाया या पिलाया गया हो? उसके साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं? जैसे ही उस खिलाने-पिलाने का असर खत्म, वैसे ही बीमारी। ये तो कुछ-कुछ ऐसे नहीं हो गया, जैसे, इन डायग्नोस्टिक्स और संभानाओं के चक्कर में, इतना कुछ मेडिसिन के रुप में खिलाके या ऑपरेशन तक करके, ना हुई बीमारियों की बाढ़ जैसे? यही हाल हैं, हमारे आज के समाज के? 

आदमी अभी वो मशीन कहाँ बना है, की कुछ भी तोड़ो-फोड़ो, कुछ भी खिलाओ-पिलाओ या कैसे भी, कहीं से भी काटो और मशीन-सा सब सही हो जाएगा?

Tuesday, April 9, 2024

बीमारी एक प्रकिर्या है

 Disease is a Process. 

नया क्या है इसमें? ये तो सबको पता है? या शायद नहीं भी पता?

और क्या हो जब वो बीमारी Autoimmune Disorder हो ? 

एक ऐसा डिसऑर्डर, जिसमें शरीर का रक्षा विभाग, अपने ही शरीर की स्वस्थ सैल (cells) को खाने का काम करने लगता है।   

जिन्हें नहीं पता उनके लिए, शरीर का भी अपना रक्षा विभाग होता है। ऐसा रक्षा विभाग, जो आज भी संसार की किसी भी डिफ़ेंस या मिलिट्री फ़ोर्स से ज्यादा ताकतवर है। जिसके बहुत से अज्ञात रहस्य, सुक्ष्म (Molecular) स्तर पर आज तक पता नहीं है की वो कैसे काम करते हैं। और कैसे डिसऑर्डर में बदल जाते हैं? इसलिए, बहुत से बिमारियों के आज तक स्थाई समाधान नहीं है। जिन्हें आज तक या तो कुछ सालों टाला जा सकता है या कहो की ज़िंदगी को थोड़ा और बढ़ाया जा सकता है, कुछ तरीके अपनाके। बहुत से केसों में, एक स्तर पे ही रोका जा सकता है। और बहुत से केसों में वापसी भी संभव है।    

आपको पता चले की आपकी नौकरी का वातावरण एक Autoimmune Disorder में बदल चुका है। तो या तो आप उससे लड़ने की कोशिश करेंगे या उससे बाहर निकलने की। शुरू-शुरू में मैंने लड़ने की कोशिश की। मगर जब लगा की यहाँ लड़ाई का स्तर कुछ ज्यादा ही ख़तरनाक हो रहा है, तो उससे कुछ वक़्त बाहर रहकर देखने की कोशिश की। क्यूँकि, अगर आप स्वस्थ ही नहीं रहोगे तो क्या तो लड़ोगे और क्या ही करोगे? ऐसे माहौल में ख़त्म ही हो जाओगे। 

मगर उस बाहर रहकर देखने ने इतना कुछ दिखा दिया की लगा, ऐसी प्रकिर्या को ख़त्म करने की ज़रूरत है या उससे जैसे भी हो सके, बाहर निकलने की। क्युंकि, मुझे जो समझाया गया या समझ आया वो ये, की ये राजनीतिक सिस्टम की प्रकिर्या है, जिसको जैसे आप चाहते हैं, वैसे ख़त्म नहीं कर सकते हैं। वो किसी एक के वश में नहीं है। चाहे फिर वो इंसान हो या पार्टी। हाँ, शायद उससे दूर हो सकते हैं। उस नौकरी से और उस जगह के सिस्टम से दूर होकर या रहकर। 

भाभी का हादसा और उस दौरान या उसके बाद जो कुछ हुआ, वो शरीर के Autoimmune Disorders का तो पता नहीं, पर किसी भी जगह के राजनीतिक सिस्टम के ऑटोइम्म्युन डिसऑर्डर  को जरुर उधेड़ रहा था। किसी भी जगह, घर, अड़ोस-पड़ोस, मौहल्ला या समाज में जब लोग आपस में ही एक दूसरे को खाने लगें, तो उसे समाज का Autoimmune Disorder कह सकते हैं। 

Social Autoimmune Disorder? 

मुझे लगता है की Social Autoimmune Disorder को समझ कर,  ऐसी बिमारियों से लोगों को सचेत जरुर किया जा सकता है। अगर सही से Molecular Autoimmune Disorder को जीव-विज्ञान की भाषा में परिभाषित नहीं भी किया जा सके, तो भी शायद से बचाया जा सकता है। और काफ़ी हद तक वापस स्वास्थ्य की तरफ मोड़ा जा सकता है। उसे समझने से पहले, कुछ बच्चों, बड़ों या बुजर्गों के खेलों पर गौर फ़रमाते हैं। ख़ासकर, जहाँ मैं पिछले तक़रीबन 2-साल से रह रही हूँ, वहाँ के ड्रामों को या खेलों को। 

क्या ये खेल या रोज-रोज के ड्रामे, लोगों की बिमारियों को भी परिभाषित कर सकते हैं?  

उनके कारणों और निवारणों को भी बता सकते हैं? 

शायद हाँ? शायद ना? मुझे लगता है, हाँ। खासकर, अगर आपको थोड़ी-बहुत इकोलॉजी या एनवायरनमेंट की भी समझ है तो। तो जानने में क्या जाता है? आते हैं आगे ऐसी कुछ पोस्ट पे। 

Sunday, January 28, 2024

Designing & Engineering of Birth, Diseases, Death & Rebirth? 5

 पुनर्जन्म क्या होता है? 

ये Entire Political Science का सबसे भद्दा रुप है। आम आदमी को बेवकूफ बना, अपना उल्लू सीधा करना। कोई एक घर से गया हुआ इंसान, किसी दूसरे घर में आ सकता है क्या? हाँ। शायद, जैसे तलाक के बाद होता है। बगैर तलाक के, संभव है?

इस घर के जन्मदिन और शादियों की तारीखें चैक करो, जहाँ से कोई इंसान दुनियाँ को ही अलविदा कह गया, जिस किसी वजह से। किस दिन गया, वो भी। और उस घर के इंसानों के जन्मदिन और शादियों की तारीखें पता करो, जिसमें कोई तलाक के बाद या दौरान ही, कोई नई बहु लाया है। जिसे इस राजनीती के चालबाज़ धंधे में in बोलते हैं। जैसे live-in . Live-in? ऐसे होता है? हमारे यहाँ आम बोलचाल की भाषा में तो उसे "चुन्नी उढ़ा लाए" बोलते हैं या "5 आदमी गए थे बयाण", बोलते हैं शायद? वैसे ये "चुन्नी उढ़ाने का" या "5-आदमी गए थे बयाण" का  रिवाज़ कब से शुरू हुआ? ये Human Robotics गढ़ने वाले कलाकारों के दिमाग की देन नहीं लगता?

सबसे बड़ी और मजेदार बात, यहाँ भी किसी एक पार्टी का मानव रोबोट के पुनर्जन्म का अधिकार सुरक्षित नहीं है। जिन-जिन पार्टियों में इतने जोड़-तोड़ और मरोड़ की काबिलियत है, वही कर देती हैं। जैसे अलग-अलग शादियों के डिज़ाइनर अलग-अलग पार्टियाँ होती हैं। वैसे ही यहाँ भी, इस तरह के आसपास ही, एक से ज्यादा नमूने देखने को मिल सकते हैं। इनके बारे में जितनी ज्यादा सही जानकारी, आपको पता होगी और इन कोढों के बारे थोड़ा बहुत ज्ञान भी, उतना ही ज्यादा, आप इनके बारे में बढ़िया से जान सकते हैं, या बता सकते हैं। और ये इस तरह की दौबारा शादीयां ही पुनर्जन्म (?) का हिस्सा नहीं है। 

जो इंसान गया है, उसके मानव रोबोट version की अगली पीढ़ी भी तो लानी है। तो क्या होगा? जहाँ से गया है, जिस हॉस्पिटल से, वहाँ आसपास से ही कोई खास पैदाइश भी मिलेगी। अब वो तारीखें भी पता कर लें। उनके माँ-बाप के नाम, पते वगैर भी। जितनी उनके बारे में जानकारी होगी, उतना ही ये समझ आएगा, की किस कदर इंसान पे कंट्रोल है, इन राजनीतिक पार्टियों का और बड़ी-बड़ी कंपनी के समूहों का। कैसे ये सामाजिक घड़ाईयाँ, महज सामाजिक व्यवस्था या सिस्टम की ही पोल नहीं खोलती, बल्की आम-आदमी के शोषण का क्रूर और भद्दे से भद्दा, रूप भी दर्शाती हैं।   

जो जाते हैं, वो वापस कहाँ आते हैं? अभी तक तो संभव हुआ नहीं। हाँ। ये आदमखोर-सिस्टम जरुर, ऐसे-ऐसे और कैसे-कैसे लोगों को खा रहा है, सिर्फ वर्चस्व की लड़ाई और कुर्सियों के चक्कर में। और कितने ही छोटे-मोटे लालच या डर, इंसान को देकर। कितने ही रिश्तों के जोड़-तोड़, कितने ही ना हुई बिमारियों के ढेर आम आदमी को देकर।     

ऊपर दी गई कई सारी सामाजिक घड़ाइयों के किरदारों के नाम तो नहीं लिखे जा सकते। मगर, ऐसे ही केसों को आप अपने आसपास से भी समझ सकते हैं। एक नहीं, शायद कई मिलेंगे।   


Saturday, January 27, 2024

Designing & Engineering of Birth, Diseases, Death & Rebirth? 6

 BP कैसे होता है (Blood Pressure)?

नसों की बीमारी क्या होती है (Nerves Problems)?

लकवा कैसे लगता है (Paralysis? Paralytic Attack?)

Lifestyle Problem?

Tension/s का होना?

डेरी उत्पादों का ज्यादा खाना-पीना?

या हानिकारक फैट्स का ज्यादा खाना-पीना?


नसों की बीमारी और नारियल पानी? South Connection? Nurse Connection?

ये नसों की बिमारियों वालों को इतना नारियल पानी क्यों बताते हैं? कहाँ से आता है ये? और कब से इसके, इतने गुणों के बारे में प्रचार-प्रसार हुआ है? 

चलो, थोड़ा-सा और जोड़ते हैं उसमें 


Experimental Executions?
On Prisoners or on masses, common people? 
  
अभी सिर्फ प्रश्नचिन्ह ही लगा सकते हैं?

अगर आपको अपने आसपास ऑक्सीजन की कमी लग रही है, तो वो सच में भी OXYGEN की कमी हो सकती है और BP जैसी कोई शिकायत भी। क्या हो, अगर OXYGEN Cylinder की बजाय, ऐसा कुछ लग जाय जैसे, NITROGEN GAS? आम आदमी को थोड़े ही पता होगा वो OXYGEN Cylinder है या कोई और?

ये तो ऐसे ही एक प्रोफेसर की FB वाल पे पढ़के दिमाग में आया। पढ़े-लिखों तक को कहाँ पता होता है, की जो दवाई हमें दी जा रही है, वो सही है की नहीं? हम तो उसपे लिखा तक नहीं पढ़ते, जब तक कोई खतरा ना नजर आए, खासकर जब कोई एडमिट होता है। और पढ़ भी लेंगे तो अंदर क्या है, इसकी गॉरन्टी हो सकती है क्या? सब विश्वास पे चलता है। मगर कोरोना के वक़्त के हादसों को जिन्होंने थोड़ा पास से झेला हो, वो कैसे विश्वास करेंगे?

नसों की बीमारी और नारियल पानी? थोड़ा और जानेंगे उसके बारे में, आगे किसी पोस्ट में। 

Wednesday, January 24, 2024

Designing & Engineering of Diseases? 4

 BP कैसे होता है (Blood Pressure)?

नसों की बीमारी क्या होती है (Nerves Problems)?

लकवा कैसे लगता है (Paralysis? Paralytic Attack?)

Lifestyle Problem?

Tension/s का होना?

डेरी उत्पादों का ज्यादा खाना-पीना?

या हानिकारक फैट्स का ज्यादा खाना-पीना?

ये नसों की बिमारियों वालों को इतना नारियल पानी क्यों बताते हैं? कहाँ से आता है ये? और कब से इसके, इतने गुणों के बारे में प्रचार-प्रसार हुआ है? 

क्या खास है, इन सबमें 

वैज्ञानिक स्तर पे?

रीती-रिवाज़ या धर्म-कर्म के स्तर पे?

राजनीती के स्तर पे?

और इन सबकी खिचड़ी पकाके, व्यवसाय के स्तर पे?   

अगर कोढ़ को जानने की कोशिश करें तो क्या समझ आएगा?   

रितु (भाभी को)  को नसों की बीमारी थी, (आम भाषा में)। 

 जितना मुझे समझ आया, उनकी समस्या क्या थी?

Hectic Lifestyle, खामखाँ की तू-तू, मैं-मैं। मगर, हमेशा नहीं कभी-कभी।  2019 के आसपास, शायद वो बढ़ गई थी। 2020 के बाद, वो कई बार हॉस्पिटल भी एडमिट हुएAPEX Hospital, Rohtak। मगर, 2-4 दिन बाद ही वापस घर आ जाते थे, ठीक-ठाक। 

2021 में मेरे Enforced Resignation के बाद, मेरा घर आना-जाना ज्यादा हो गया था। 2022 में मैंने कैंपस हॉउस से अपना तकरीबन सामान उठा लिया था। या कहूँ की उठवा दिया गया था। भाई-भाभी की जब कभी अनबन होती और रुठ के अपने मायके चले जाते तो ज्यादातर मैं ही लाती थी। ताकी उन्हें कहने को हो जाए, की मैं खुद नहीं आई, दीदी लाए हैं। और भाई की खामखाँ की ऐंठ, भी बनी रहती। मगर घर आने पे ज्यादातर अपने आप सही हो जाता था। माँ को वो कोई खास पसंद नहीं थी। या कहना चाहिए की शादी से पहले ही, उन्होंने मना कर दिया था। मगर नए दौर के बच्चों के सामने चली नहीं। अब कोर्ट में शादी कर ली और बाकी सब साथ, तो कोई खास आपत्ति भी नहीं थी। क्यूँकि, देखने में भी ठीक-ठाक थी और उसके लाडले से ज्यादा पढ़ी हुई भी। भाई के आर्य मॉडल स्कूल में ही पहली बार पढ़ाना शुरू किया था, खुद की पढ़ाई के, एक तरह से साथ-साथ ही। जब बड़े भाई को पता चला, तो उन्होंने डाँट के उन्हें स्कूल से निकाल दिया। उन्होंने भाई को बोला, की अगर अभी शादी नहीं की तो मैं तो मरुँगी। और लो जी, शादी हो गई। प्यार शायद इसी को कहते हैं। 

दूसरी तरफ, वो दिल्ली का केस, जहाँ पे कोई टाइम पास (Experiments on innocent girls?) कहे, की मैंने कुछ किया है, नहीं ना? वो भी किसी सत्यवान सांगवान के घर, सीनियर, जिनके यहाँ शायद किसी चाय-पानी पे गए थे। या मेरा डॉक्टर भाई, मेरे लिए कोई डॉक्टर ढूंढ रहा है। लड़की क्या सोचेगी, ऐसे इंसान के बारे में?  शायद यही, ये तो बढ़िया है। डॉक्टर से शादी करो। कोई संदीप शर्मा, थोड़े वक़्त रामजस कॉलेज में adhoc टीचिंग के बाद निकल जाता है किसी स्विटज़रलैंड पोस्टडॉक के लिए। और विजय दांगी PhD के लटकों-झटकों को झेलते हुए, फ्लोरिडा, अमेरिका। जब तक 2020 का covid नहीं देखा, समझा और झेला, तब तक समझ ही नहीं आया था, की दुनियाँ में ऐसी-ऐसी और कैसी-कैसी बीमारियाँ भी होती हैं। और कैसे-कैसे बीमारियों के बहाने, लोग दुनियाँ को अलविदा कहते हैं। खैर ये पूरी कहानी, आपको किसी किताब में पढ़ने को मिलेगी। Rohtak से Delhi और Gainesville Florida, बहुत ही थोड़े से वक़्त के लिए। और फिर वापस MDU, मगर किसी नए-नए खुले DET (Department of Engineering) में। जिसका बाद में नाम हुआ, UIET (University Institute of Engineering and Technology) । वहाँ joining के कुछ ही महीने बाद, किसी SUV ने ठोक दिया। आगे तो कहानी है।  

जगहों के नाम, डिपार्टमेंट, डिग्री, विषय, रुम नंबर, लैब नंबर, इंस्ट्रूमेंट्स, प्रोजेक्ट्स, केमिकल्स, स्टुडेंट्स, हाउसिंग टाइप्स, हाउस नंबर या कहो जो कुछ भी आप देख-सुन और अनुभव कर सकते हैं, अपने आप में, एक कोढ़ है, राजनीती का, इस सिस्टम का। 

इंसान, उनके रिश्ते-नाते, जन्मदिन, मरण-दिन, बीमारियाँ सब कोढ़ हैं। हम सबको बड़े-बड़े खिलाडियों ने या कहो पार्टियों ने, अपनी-अपनी तरह की गोटियाँ बना दिया है। एक तरह के वैरिएंट्स (Variants)। आप उनमें कितना फिट होते हैं और कितना नहीं, कहाँ फिट होते हैं और कहाँ नहीं, कब फिट होते हैं और कब नहीं, ये सब इन पार्टियों की चालें बताती हैं। वो चालें, ये आप पर ऐसे ही चलती हैं, जैसे लैब में किसी चूहे, पौधे, बैक्टीरिया पर एक्सपेरिमेंट्स। आज का हमारा समाज एक बड़ी लैब है। जिसकी इंजीनियरिंग, ये पढ़े-लिखे और उसपे कढ़े हुए, लोगों के समूह करते हैं।   

वापस रितु पर आएँ? जब रितु चौधरी की शादी परमवीर सिंह (सिंह? कब से?) से हुई, उसी वक़्त आसपास कोई और भी इंटरकास्ट शादी हुई थी। अलग-अलग पार्टियों के अलग-अलग डिज़ाइन, उनकी फिटिंग के अनुसार। रितु? रितू चौधरी या रितु कादयान? या रितु दांगी? रितु दांगी के किसी नेक्स्ट जनरेशन (NG?) वैरिएंट की फिटिंग कहीं किसी और रितु पर हुई, मगर ज्यादा चली नहीं। ऐसे ही पार्टियों के कितने ही हेरफेर होते हैं, लोगों की ज़िंदगियों पर, रिश्तों पर, उनके बच्चों की पैदाइश पर या पैदा ही ना होने देने पर। और मौत पे भी। 

Ritu इन पिछले कुछ सालों में APEX (अपैक्स कोर्ट क्या होता है?) से होते हुए PGI गई, और खत्म? ये नसों की कहानी है? किसी सिस्टम के, ये बताने की भी, की वो कैसे काम करता है? रितु, जिस स्कूल से इस घर में आई थी, क्या वही स्कूल उसे खा गया? क्या, ये कोरोना के अपडेट की, एक सामाजिक सामांतर घड़ाई है? 

इस सबका HD पब्लिक स्कूल, बहुअकबरपुर और आर्य मॉडल स्कूल से क्या लेना-देना हो सकता है? क्या वहाँ भी कोई अपडेट चल रहा है? 

ये मोदी का लक्षयद्वीप विजिट क्या है? 

इसका किसी लक्ष्य से या आर्य मॉडल स्कूल या सुनील की 2-कनाल जमीन हड़पने से कोई लेना-देना हो सकता है? अजीबोगरीब कोढ़ हैं।   

KANTA भाभी, वापस करेंगे ये ज़मीन या कोर्ट चलेंगे? या अबकी बार मुझे ही उठा देंगे? या उठवा देंगे? ये पब्लिक नोटिस आपके लिए। स्कूल है या लोगों को उठाने का धंधा?      

और HD डिज़ाइन क्या है, इसमें?      

वैरिएंट्स, अलग-अलग पार्टी के और अलग-अलग तरह की और तरीके से लड़ाइयाँ?      

Designing & Engineering of Diseases? 3

 पत्ता बेगम, पथ्थर, और पथ्थरी?

क्या मतलब हो सकता है, इस सबका 

वैज्ञानिक स्तर पर?

रीती-रिवाज़ या धर्म-कर्म के स्तर पे?

राजनीती के स्तर पे? 

इन सबकी खिचड़ी पकाके व्यवसाय के स्तर पे, या कहो की पैसे बनाने के स्तर पे?

थोड़ा बहुत इधर-उधर से भी जान लें, फिर जोड़ेंगे इसमें थोड़ा और। तब तक आप भी सोचिए, ठीक ऐसे ही और बीमारियों के बारे में।         

  

Designing and Engineering Diseases? 2

 2019 में मारपिटाई के बाद काफी कुछ बदला। एक तरह से यूनिवर्सिटी से बाहर होने की शुरुवात। उस मारपिटाई का शायद मतलब ही यही था। उस विकास सिवाच या सज्जन या किसी भी कुर्सी पर बैठे अधिकारी का कुछ हुआ क्या? 

हम उस समाज में हैं, जहाँ आम-आदमी, हर तरह से, हर जगह भुगतता है। उसका नमूना आगे का वक़्त रहा। दिसंबर Exams फ्रॉड और उधर माँ का ऑपरेशन। क्या खास था, उस ऑपरेशन में? आँखों देखा और अनुभव किया गया हाल, की बीमारियों या उनके इलाजों के नाम पे हॉस्पिटल्स में क्या कुछ होता है। आदमी एक खिलौना है। अगर आपके पास पैसा और पावर है, तो आप उससे कैसे भी खेल सकते हैं। उस पावर का साथ देता है, यहाँ-वहाँ लोगों का छोटा-मोटा लालच। जैसे अगर प्राइवेट हॉस्पिटल है, तो उन्हें भी तो चाहिए कमाने के लिए पैसा। ऐसे ही थोड़ी, इतनी बड़ी-बड़ी इमारतें और इतना स्टाफ रख सकते हैं। इतने सारे प्राइवेट हॉस्पिटल्स, मतलब सरकारी हॉस्पिटल्स जनसँख्या को देखते हुए, जैसे हैं ही नहीं। हैं तो हद से ज्यादा भीड़ और सुविधाओं की कमी। इससे आगे भी कुछ है शायद? वो 2020 में शुरू हुए कोरोना काल ने समझाया। 

जैसे पीछे लिखा, हर अपडेट, अपडेट नहीं होता। कभी-कभी रिवर्स गियर भी होता है। और कभी-कभी किसी खास वक़्त पे, स्टॉप भी लगा दिया जाता है। सिस्टम चलाने वालों की जरुरतों के हिसाब-किताब से। जैसे कहीं, 2020 शुरू हो चूका था तो कहीं आगे तक 2018 या 2019 चल रहा था या कहना चाहिए की चल रहा है। इसी को शायद, टाइम मशीन बोलते हैं, इस कोढ़ वाले सिस्टम की परिभाषा के अनुसार? इसीलिए जोड़-तोड़ और  मरोड़ होते हैं, किस्से कहानियों में और लोगों की ज़िंदगियों में। कहीं, इस पार्टी के किस्से-कहानी, तो कहीं उस पार्टी के। 

माँ का ऑपरेशन कुछ-कुछ ऐसा ही था। देखो तो कुछ भी नहीं। छोटा-सा GALL-BLADDER STONE का ऑपरेशन। जिसमें, तीन कट इधर-उधर थे, तो एक नावल के पास। मगर जहाँ-जहाँ ले जाया गया या शायद जो कुछ उस दौरान देखा या समझा, वो कुछ और ही था। 

March 2020 में ऑफिशियली कोरोना शुरू हो चुका था। मेरा खुद का अजीबोगरीब बैक साइड दर्द और  हॉस्पिटल टैस्टिंग और ड्रामा। और ड्रामे के कोढ़ को समझते हुए मेरा रोहतक छोड़, अपने गाँव नो दो ग्यारह हो जाना। मजेदार ये की दर्द का भी गुल हो जाना। कहाँ गई गाँव आते ही वो पथ्थरी?  

उसके बाद 2021 में, मेरा खास ड्रामे के साथ PGI VC, OFFICE के बैक साइड, ATM से, पुलिस द्वारा अपहरण। और फिर खास साढ़े तीन दिन (3.5) का SUNARIYA JAIL, Rohtak का दौरा। वो सब आप Kidnapped by Police, Campus Crime Series में पढ़ सकते हैं।

समझ आया कुछ, अपहरण क्या होता है और पथ्थरी की बीमारी क्या है? 

1 मेरा अपहरण पुलिस द्वारा, PGI VC, OFFICE के बैक साइड, ATM से 26-4-2021 से 29-4-2021 तक। पता नहीं इसी दो और नौ (29) का मतलब ही, नौ दो ग्यारह होता है क्या?  

2 गुड़िया का अपहरण, जैसे अपने ही लोगों द्वारा, उसकी माँ के जाने के बाद (1 Feb, 2023)। इन्हीं इधर-उधर के खास अपनों ने, माँ और छोटे भाई को बेवकूफ बनाया हुआ है। और इन माँ-बेटे को मालूम ही नहीं, की कैसे और क्यों ये सब हुआ है, जो कुछ हुआ है या हो रहा है। इन दूसरों को बेवकूफ बनाने वालों को भी, कोई और बेवकूफ बना रहा होगा? किसी छोटे-मोटे लालच के लिए? या किसी तरह का डर दिखाकर शायद? मजेदार ताने-बाने हैं ये, देखने और समझने लगो तो।   

इसका और इसके बाद जो कुछ हुआ, का लेना-देना, सीधे-सीधे, मेरा कैंपस क्राइम सीरीज, के पब्लिकेशन को रोकना रहा। अगर रोका ना जा सके, तो जितना हो सके, उतना आगे खिसकाना। क्यूँकि, ये सब इधर-उधर दी गई धमकियों के बाद हुआ है, जितना मुझे समझ आया।  

जैसे एक तरफ वो पीने वाले भाई को शराब सप्लाई करेंगे। उसका फ़ोन उठा लेंगे या बंद करवा देंगे। फिर उल्टा-पुल्टा पढ़ा, उससे घर में सांग करवाएंगे। पीता है, को पीटा है? फिर लालच के दलदल में सवार लोग, उसका अपहरण कर जमीन ले लेंगे, खास स्कूल वाली जमीन, जिसके अपने राजनीतिक कोढ़ हैं। मतलब सबकुछ राजनीतिक कोढ़ और कुर्सियाँ हैं। उसके लिए जो कुछ भी करना पड़ेगा, करेंगे।   

3. सुनील,पीने वाले भाई का अपहरण जैसे, फिर से अपने कहे जाने वाले या आसपास के ही लोगों द्वारा। खासकर, चाचा के लड़के का और इस दूसरे दादा के कुनबे का इसमें अहम रोल। नाम जानना चाहेंगे इस भतीजे का और उसकी माँ का? आएँगे, धीरे-धीरे उसपे भी। सोशल अपडेट या hold on या reverse gear जैसी-सी, किसी सामाजिक किस्से-कहानी की पोस्ट के साथ। सामाजिक किस्से-कहानियाँ, सामाजिक इंजीनियरिंग के, राजनीतिक पार्टियों द्वारा। जितनी पार्टियाँ, उतने ही किस्से और कहानियाँ और लोगों की ज़िंदगी की हकीकतें।          

इन सबमें Mind Twisters, Surveillance abuse and technology abuse होता है। हॉस्पिटल क्या, स्कूल क्या, यूनिवर्सिटी क्या, पराये क्या, अपने क्या, जिस किसी का दाँव लग जाए, इस लालच के भवसागर में, जैसे अपने पाप धोते नजर आएंगे। ठीक वैसे, जैसे हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और। हालाँकि, सारी दुनियाँ तो बुरी नहीं हो सकती। कुछ ही होते हैं। ज्यादातर आम आदमी, कल भी भले थे, विश्वास करने लायक भी और आज भी।     

वैसे, कैसे होती है ये पथ्थरी की बीमारी? या ऐसी-ऐसी, कितनी ही सामाजिक सामान्तर घड़ाईयाँ? आएँगे आगे इनपे भी किन्हीं और पोस्ट में?

कितनी ही तरह के बुखार, कैंसर, लकवा, शुगर और पता ही नहीं कितनी ही बीमारियाँ, ऐसे ही होती होंगी?   

Enforced Hair Looks Try & Diseases?

 ये पोस्ट, 11 जनवरी, 2015 को लिखी थी, "Not A Movie Buff"। 


मैं शायद ही कभी कोई मूवी थिएटर में देखती हों। क्या हुआ कभी-कभार, दोस्तों के साथ। ऑनलाइन भी कभी-कभी। वो भी उसके Reviews पढ़ने के बाद या इधर-उधर से पता लगने पे की अच्छी मूवी है, देखने लायक। जब ये पोस्ट लिखी, उन दिनों एक विज्ञापन काफी आ रहा था। सोचा, देखुं तो क्या खास है। ठीक-ठाक मूवी थी। कोई बहुत खास नहीं। मगर, उसके कई सालों बाद, 2018 या 2019 शायद, बहुत कुछ देखा ऑनलाइन। बिल्कुल ऐसे, जैसे कोई पढ़ाई हो रही हो या शौध या खास कुछ जानने की कोशिश। थोड़ा बहुत लगा, की कुछ तो खास है, इस मूवी में। मगर क्या? खासकर, ये ट्रेलर। कोई किसी जैसा-सा भी दिख रहा है? खास किरदार जैसे? भारती? 

मगर कुछ कमैंट्स पढ़कर पता चला, वो तो तुमसे जोड़ रहे हैं। हाँ। हो सकता है। इस मूवी के देखने के कुछ साल बाद जो हुआ। Psycho अनुभव और फिर H#16 मारपिटाई। और फिर शायद, कुछ-कुछ ऐसा-सा ही हुलिया बनाने की जबरदस्त कोशिश। बाल कटवा लो। बाल कटवा लो। आपपे छोटे बाल अच्छे लगेंगे। शायद किसी ने बताया होगा उन्हें, की कभी ऐसा-सा हुलिया था मेरा। मगर जबसे बाल बढ़ाने शुरू किए, फिर वापस छोटे करवाने की कभी नहीं सोची। वो उस वक़्त सही थे। मेरे फेवरिट भी। मगर, अब मुझे इतने छोटे बाल खुद पर नहीं जचते। इससे आगे उस वक़्त का कुछ नहीं है, इस मूवी में। ये ऐसे है, जैसे हुलिया किसी वक़्त का उठा लिया और फिर कहानी किसी वक़्त की उठा के, किसी और ही वक़्त में फिट करने की कोशिश।  

थोंपने वालों की नहीं चली तो बाल जला दिए, किसी हेयर ट्रीटमेंट में। मगर मैं भी जिद्दी, कटवाए फिर भी नहीं। उसपे कलर भी करना छोड़ दिया। कोरोना ऑनलाइन टाइम था। घर से पढ़ाना था, तो चल गया। मगर इस सबने और कई सारे ऐसे-ऐसे Enforcements ने, सोशल इंजीनियरिंग और बीमारियों के बारे में जरुर कुछ समझाया। विटिलिगो, लकवा, शुगर, कैंसर भी ऐसे ही हो सकता है क्या? और उनकी अलग-अलग stages भी? फिर तो कहीं ना कहीं स्टॉप या रिवर्स भी संभव है? सोशल अपडेट क्या और कैसे होते हैं? और उनका प्रभाव, कितने लोगों पर और कहाँ-कहाँ होता है। सबसे अहम, कैसा-कैसा होता है? जानते हैं, अगली पोस्ट में।       

नीचे पुरानी पोस्ट।         

SUNDAY, JANUARY 11, 2015

Do not know why, some trailers keep on coming time and again? And you cannot resist but to watch. Though I do not like much dishum-dishum and violence but I found this one interesting to watch, especially the story. 
I am not a movie buff and rarely watch movies in theaters. So do not know, if I will watch this one or not, but trailer is interesting. 


In the world, fight is all about fractions, factions, views difference and control. It's kinda my way or no way. Day by day, with the inventions of new technologies, this fight is getting uglier and manipulative. Public want more transparency. Dictators need more and more secrecy, on whatever name.